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कुछ अनकही..............
वक़्त-बे-वक़्त भटकते कदमों को ,मंजील का कोई नीशान नहीं मीलता, दम तोड़ रही हैं ख्वावीसें जमीन पर, ख्वाबों मे भी उन्हें "अपना आश्मान" नहीं मीलता....
तो क्या हुआ जो मीट गया आखरी नीशान भी मंजील का, राह मे मेरी उम्मीदों के दीये जलाये रखना, मीट भी जाये गर मेरे सारे आशीयाने, दील मे मेरे मोहब्बत का जज्बा बनाए रखना.........
जीस राह पर मे चला था ,कभी जाकर उस राह पर देखना, टूटे हुए मेरे ख्वाबों के टुकडे हर जगह पाओगे, आंखों से जो कह गया हूँ मे जींदगी की दास्ताँ, दील तक पहुचाने दो ,सब समझ जाओगे..........

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