गाँव मे मेरे ,हर घर मे चर्चा मेरा आम था,आप के शहर मे आकर मे अजनबी हो गया.....घर से नीकला था दील मे कुछ अरमान लेकर,कुछ अपनो के,कुछ परायों के ,हलके से अहसान लेकर.....सपने टूटे ,अपने रूठे ,जाने ये क्या हो गया,ठोकर लगी गीरा जो मे तो,लोगों की "कहकशी" हो गया..............................................मे अजनबी हो गया......इन दौड़ती भागती सडकों पर ,मे खुद से ही दूर था बहुत,दर-दर भटकते इन कदमों से मे मजबूर था बहुत,मन मे थी एक कसक,जाने यहाँ क्या खो गया,मंदीर,मस्जीद,गुरूद्वारे जा-जा कर मे "मजहबी" हो गया..............................................मे अजनबी हो गया......आया तो पाया यहाँ हर चीज पैसों के पीछे दौड़ती है,आपके शहर की हरेक गली मे जींदगी दम तोड़ती है,नाम कमाने आया था ,गुमनाम हो कर कहीं खो गया,कभी न थमती इन बेबसों की भीड़ मे ,मैं "बेबसी" हो गया..............................................मे अजनबी हो गया......*(Thereare some spelling mistakes in hindi posts which have been donedeliberately to make them readable and compatible with all types of webbrowsers.) Hit Counter