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sirf tum............
छिितज से छिितज तक बस तुम ही तुम हो,
तुम्हारी इन झील से गहरी आँखों मे , डूब गए मेरे जीवन के हर पल, तुम्हारी इन खुलती बंद होती पलक़ों से, चांदनी कभी िदख़ती है ,कभी होती है ओझल !
तुम्हारे इन सुर्ख होंटों से िनकले बोल, उतर जाते हैं मन के रस्ते िदल तक, और तुम्हारे इस शर्म से झुके चहरे को देखने, मेरी नजरें हर मुश्िकलें पार कर पहुंच जाती हैं तुम तक !
वह तुम हो हाँ तुम ही तो हो, िजसने मेरे हरेक ख्याल को चुरा िलया है, कल तक रखा था िजन्हे प्यार से सहेजकर, उन लम्हों को पलभर मे अपना बना िलया है !
अब तो समझो मेरी बेकरारी का आलम, िक ये नजरें अब और इन्तेजार न कर पायेंगी, तुम जो चली जाओगी कभी मझसे दूर, मेरी साँसे बस उसी पल थम जायेंगी !
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