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कोई िशकायत नहीं...............
हूँ जो मे तनहा तो तनहा ही सही , मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
हमराही िमले कई ,हमसफ़र एक न िमला, हरेक ने छोड़ा साथ,िकस-िकस से करें िगला, सुनसान सफर िक गुमनाम है मंिजल,तो गुमनाम ही सही ! ..............मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
कुछ न भाया तो पुरानी यादें ताजा कर ली, पाया जो ख़ुद को अकेला तो आईने से दोस्ती कर ली, गर िबछडो से न हो िमलना तो न िमलना ही सही ! ..............मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
यूं तो मुझमे कुछ भी ख़ास नहीं, पर है यकीन मेने तोडा िकसी का िवश्वास नहीं, यूं लगते रहे मुझ पर इल्जाम,तो इल्जाम ही सही। ..............मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !
एक िदन मे जब िजन्दगी से थक जाऊंगा, इस तनहा से सफर मे जब कहीं रुक जाऊंगा, न िमल पायेगी मंिजल तो ना िमल पाना ही सही, .............मुझे िजन्दगी से कोई िशकायत नहीं !

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