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 18:09 | 9/Mar/2008 | 34 Comment(s)
Salam Bhopal..............



Dec. 2-3, 1984-The Bhopal Gas Tragedy........One Of The Biggest
Disasters in the World in Which More Than 20,000 People Were Killed and More Than 170,000 Were SEVERELY
AFFECTED........It Has Been 23 Years Since Then But the Effect of that
Disaster is Still Continuing.......Here are Few Lines Dedicated to All
Who Were Affected
by This Disaster............


उम्र की चादर ओढे , यादों की लाठी िलये,
ग़मों की सर्द हवाओं से बचने , बेठे हे उम्मीदों के िचराग तले !

नयी सुबह के इंतज़ार मे ,
वक़्त की बहती धुप- छांव मे,
कुछ बुझे से कुछ थके से ,
कुछ लाचारी के बोझ तले !

चहरे से झलकती है तन्हाई
दूर-दूर तक नहीं कोई परछाई
कुछ डरे से,कुछ सहमे से,
कुछ बेदर्द ग़मों के दर्द तले !

खामोश िगगाहें तकती हैं राहें,
टूटे िबखरे ख्वावों से कैसे यकीन िदलायें,
कुछ बहके से,कुछ िसमते से,
कुछ मायुशी के गर्त तल !


  
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Permalink 
 21:43 | 26/Feb/2008 | 34 Comment(s)
कोई िशकायत नहीं...............

हूँ जो मे तनहा तो तनहा ही  सही ,
मुझे िजन्दगी  से कोई िशकायत नहीं !

हमराही िमले कई ,हमसफ़र एक िमला,
हरेक ने छोड़ा साथ,िकस-िकस से करें िगला,
सुनसान सफर िक गुमनाम है मंिजल,तो गुमनाम ही
ही !
..............
मुझे िजन्दगी  से कोई िशकायत नहीं !

कुछ भाया तो पुरानी यादें ताजा कर ली,
पाया जो ख़ुद को अकेला तो आईने से दोस्ती कर ली,
गर िबछडो  से हो िमलना तो िमलना ही सही !
..............मुझे िजन्दगी  से कोई िशकायत नहीं !

यूं तो मुझमे कुछ भी ख़ास नहीं,
पर है यकीन मेने तोडा िकसी का िवश्वास
नहीं,
यूं लगते रहे मुझ पर इल्जाम,तो इल्जाम ही
सही।
..............मुझे िजन्दगी  से कोई िशकायत नहीं !

एक िदन मे जब िजन्दगी  से थक जाऊंगा,
इस तनहा से सफर मे जब कहीं रुक जाऊंगा,
िमल पायेगी मंिजल तो ना िमल पाना ही सही,
.............मुझे िजन्दगी  से कोई िशकायत नहीं !


 

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Permalink 
 19:11 | 12/Feb/2008 | 36 Comment(s)
sirf tum............


छिितज से छिितज तक बस तुम ही तुम हो,

तुम्हारी इन झील से गहरी आँखों मे ,
डूब गए मेरे जीवन के हर पल,
तुम्हारी इन खुलती बंद होती पलक़ों से,
चांदनी कभी िदख़ती है ,कभी होती है ओझल !

तुम्हारे इन सुर्ख होंटों से िनकले बोल,
उतर जाते हैं मन के रस्ते िदल तक,
और तुम्हारे इस शर्म से झुके चहरे को देखने,
मेरी नजरें हर मुश्िकलें पार कर पहुंच जाती हैं तुम तक !

वह तुम हो हाँ तुम ही तो हो,
िजसने मेरे हरेक ख्याल को चुरा िलया है,
कल तक रखा था िजन्हे प्यार से सहेजकर,
उन लम्हों को पलभर मे अपना बना िलया है !

अब तो समझो मेरी बेकरारी का आलम,
िक ये नजरें अब और इन्तेजार कर पायेंगी,
तुम जो